श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.44.15 
नाचार्यस्यानपाकृत्य प्रवासं
प्राज्ञ: कुर्वीत नैतदहं करोमि।
इतीव मन्येत न भाषयेत
स वै चतुर्थो ब्रह्मचर्यस्य पाद:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
विद्वान शिष्य को चाहिए कि वह अपने गुरु का उपकार चुकाए बिना अर्थात् गुरुदक्षिणा आदि देकर उन्हें संतुष्ट किए बिना अन्यत्र न जाए। [दक्षिणा देकर या गुरु की सेवा करके] वह अपने मन में कभी यह विचार न करे कि मैं अपने गुरु पर उपकार कर रहा हूँ और न ही कभी ऐसा कहे। यह ब्रह्मचर्य का चौथा सोपान है।॥15॥
 
A learned disciple should not go anywhere else without repaying the favours of his teacher i.e. without satisfying him by giving Guru Dakshina etc. [By giving Dakshina or serving the Guru] he should never think in his mind that he is doing a favour to his teacher and should never say such a thing. This is the fourth step of Brahmacharya.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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