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mahabharat 5.44.12: यदि कोई मन, वाणी और कर्म से गुरु को प्रसन्न करने के लिए अपने प्राण और धन का भी त्याग कर दे, तो भी यह दूसरा चरण कहलाता है ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 5.44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.44.12 
आचार्यस्य प्रियं कुर्यात् प्राणैरपि धनैरपि।
कर्मणा मनसा वाचा द्वितीय: पाद उच्यते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई मन, वाणी और कर्म से गुरु को प्रसन्न करने के लिए अपने प्राण और धन का भी त्याग कर दे, तो भी यह दूसरा चरण कहलाता है ॥12॥
 
Even if one sacrifices his life and wealth to please his teacher by mind, speech and action, this is called the second step. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)