श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.44.10 
गुरुं शिष्यो नित्यमभिवादयीत
स्वाध्यायमिच्छेच्छुचिरप्रमत्त:।
मानं न कुर्यान्नादधीत रोष-
मेष प्रथमो ब्रह्मचर्यस्य पाद:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मचारी शिष्य को सदैव गुरु को प्रणाम करना चाहिए, भीतर-बाहर से पवित्र रहना चाहिए, प्रमाद का त्याग करना चाहिए, स्वाध्याय पर ध्यान देना चाहिए, अभिमान नहीं करना चाहिए, मन में क्रोध को स्थान नहीं देना चाहिए। यह ब्रह्मचर्य का प्रथम सोपान है ॥10॥
 
A celibate disciple should always bow to his Guru, be pure from inside and outside, give up negligence, concentrate on self-study, should not be proud, should not give place to anger in the mind. This is the first step of celibacy. ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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