श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.43.8 
तदर्थमुक्तं तप एतदिज्या
ताभ्यामसौ पुण्यमुपैति विद्वान्।
पुण्येन पापं विनिहत्य पश्चात्
संजायते ज्ञानविदीपितात्मा॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इसकी प्राप्ति के लिए वेदों में तप और यज्ञ का विधान किया गया है। इन तप और यज्ञों के द्वारा वह श्रोत्रिय विद्वान् पुरुष पुण्य प्राप्त करता है। फिर निष्काम कर्मरूपी पुण्य से पाप का नाश करके उसका अन्तःकरण ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है। 8॥
 
To achieve this, penance and yagya have been prescribed in the Vedas. Through these penances and yagyas, that Shrotriya learned man attains virtue. Then, after destroying the sin with the virtue of selfless action, his conscience becomes enlightened with knowledge. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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