श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  5.43.63 
धर्मादिषु स्थितोऽप्येवं क्षत्रिय ब्रह्म पश्यति।
वेदानां चानुपूर्व्येण एतद् बुद्धॺा ब्रवीमि ते॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
राजन! उपर्युक्त धर्म में स्थित होकर तथा वेदों का भी क्रमपूर्वक (विधिपूर्वक) अध्ययन करके मनुष्य उसी प्रकार परमात्मा को प्राप्त करता है। मैं अपनी बुद्धि से निश्चय करके यह बात तुमसे कह रहा हूँ॥63॥
 
Rajan! By being situated in the above mentioned religion and also by studying the Vedas sequentially (methodically), man realizes God in the same way. I am telling you this after deciding with my intellect. 63॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्सुजातपर्वमें सनत्सुजातवाक्यविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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