श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  5.43.62 
प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नर:।
सत्ये वै ब्राह्मणस्तिष्ठंस्तद् विद्वान् सर्वविद् भवेत्॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष (योगी) सम्पूर्ण लोकों को प्रत्यक्ष देखता है, वह उन सम्पूर्ण लोकों का द्रष्टा कहा जाता है; परंतु जो एकमात्र सत्स्वरूप ब्रह्म में स्थित है, वह ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण सर्वज्ञ है ॥62॥
 
The person (yogi) who sees all the worlds directly is called the seer of all those worlds; But the one who is situated in the only true form of Brahma, that Brahmavetta Brahmin is omniscient. 62॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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