श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  5.43.60 
मौनान्न स मुनिर्भवति नारण्यवसनान्मुनि:।
स्वलक्षणं तु यो वेद स मुनि: श्रेष्ठ उच्यते॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
केवल मौन रहने या वन में रहने से कोई मुनि नहीं बन जाता। जो अपनी आत्मा के स्वरूप को जानता है, वही महामुनि कहलाता है।
 
One does not become a muni merely by remaining silent or living in the forest. He who knows the nature of his soul is called a great muni. 60.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)