श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  5.43.59 
तूष्णीम्भूत उपासीत न चेष्टेन्मनसापि च।
उपावर्तस्व तद् ब्रह्म अन्तरात्मनि विश्रुतम्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रियों की समस्त चेष्टाओं से रहित होकर तथा मन से भी कोई चेष्टा न करके भगवान् का भजन करना चाहिए। राजन्! तुम भी बुद्धिपूर्वक अपने हृदयाकाश में स्थित उस प्रसिद्ध भगवान् का भजन करो। 59॥
 
One should worship God without all kinds of efforts of the senses and should not make any efforts even with the mind. Rajan! You too worship that famous God present in the space of your heart intelligently. 59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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