श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  5.43.58 
तस्य पर्येषणं गच्छेत् प्रत्यर्थिषु कथञ्चन।
अविचिन्वन्निमं वेदे तप: पश्यति तं प्रभुम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
आत्मा को अध्यात्म-विहीन वस्तुओं में मत खोजो, वेदों की ऋचाओं में भी मत खोजो; केवल ध्यान के द्वारा ही परमेश्वर का दर्शन करो ॥ 58॥
 
Do not search for the Self in non-Spiritual things at all, do not look for it even in the verses of the Vedas; instead seek the vision of the Supreme Lord only through meditation. ॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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