श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  5.43.56 
अभिजानामि ब्राह्मणं व्याख्यातारं विचक्षणम्।
यश्छिन्नविचिकित्स: स व्याचष्टे सर्वसंशयान्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
मैं उसी को ब्राह्मण मानता हूँ जो परमात्मा के तत्त्व को जानता है और वेदों का ठीक-ठीक अर्थ करने में समर्थ है, जिसके अपने संशय दूर हो गए हैं और जो दूसरों के भी सब संशय दूर कर सकता है ॥ 56॥
 
I consider only that person to be a Brahmin who knows the essence of God and is able to interpret the Vedas correctly, whose own doubts have been cleared and who can clear all the doubts of others as well. ॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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