श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  5.43.52 
न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति
कश्चित् त्वेतान् बुध्यते वापि राजन्।
यो वेद वेदान् न स वेद वेद्यं
सत्ये स्थितो यस्तु स वेद वेद्यम्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
राजन! वास्तव में वेदों का सार कोई नहीं जानता, अथवा यूँ कहिए कि उनका रहस्य कोई विरला ही जान सकता है। जो केवल वेदों के वाक्यों को जानता है, वह उस परमात्मा को नहीं जानता, जिसे वेदों के द्वारा जाना जा सकता है; किन्तु जो सत्य में स्थित है, वह उस परमात्मा को जानता है, जिसे वेदों के द्वारा जाना जा सकता है।
 
King! In reality, no one knows the essence of the Vedas or you can say that only a few can know their secret. One who only knows the sentences of the Vedas does not know the Supreme Being who can be known through the Vedas; but one who is situated in the truth knows the Supreme Being who is known through the Vedas.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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