श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  5.43.51 
छन्दांसि नाम द्विपदां वरिष्ठ
स्वच्छन्दयोगेन भवन्ति तत्र।
छन्दोविदस्तेन च तानधीत्य
गता न वेदस्य न वेद्यमार्या:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! ऋचाएँ (वेद) ईश्वर के साथ स्वतन्त्र सम्बन्ध में स्थित (स्वतःसिद्ध) हैं। अतः इनका अध्ययन करके ही विद्वान आर्यों ने वेदरूपी ईश्वरतत्त्व को प्राप्त किया है। 51॥
 
Narashrestha! The verses (Vedas) are situated (self-evident) in a free relationship with God. Therefore, it is only by studying them that the learned Aryans have attained the essence of God in the form of Vedas. 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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