श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  5.43.49 
तस्मात् क्षत्रिय मा मंस्था जल्पितेनैव वै द्विजम्।
य एव सत्यान्नापैति स ज्ञेयो ब्राह्मणस्त्वया॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
इसलिए महाराज! केवल शब्द-रचना से किसी को ब्राह्मण मत समझो। जो भगवान के सच्चे स्वरूप से कभी विमुख नहीं होता, उसे ही ब्राह्मण समझो। 49॥
 
That's why Maharaj! Don't consider someone a Brahmin just by making words. The one who is never separated from the true form of God, consider him as a Brahmin. 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)