| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण » श्लोक 48 |
|
| | | | श्लोक 5.43.48  | ज्ञानं वै नाम प्रत्यक्षं परोक्षं जायते तप:।
विद्याद् बहु पठन्तं तु द्विजं वै बहुपाठिनम्॥ ४८॥ | | | | | | अनुवाद | | क्योंकि भगवान् के ज्ञान का फल प्रत्यक्ष है और ध्यान का फल अप्रत्यक्ष है (इसलिए ज्ञान का ही आश्रय लेना चाहिए) जो ब्राह्मण बहुत अध्ययन करता है, उसे ही बहुपति (ज्ञानी व्यक्ति) समझना चाहिए॥48॥ | | | | Because the fruit of the knowledge of God is direct and the fruit of meditation is indirect (that is why one should take recourse to knowledge only). A Brahmin who studies a lot should be considered only a bahupathi (knowledgeable person). ॥ 48॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|