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mahabharat 5.43.45: वास्तव में, जो लोग ईश्वर के सच्चे स्वरूप से भटक गए हैं, वे ही ऐसे विचार रखते हैं। फिर सच्चे वेदों की प्रामाणिकता का पता लगाकर ही वे यज्ञ करते हैं॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 5.43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.43.45 
सत्यात् प्रच्यवमानानां संकल्पश्च तथा भवेत्।
ततो यज्ञ: प्रतायेत सत्यस्यैवावधारणात्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में, जो लोग ईश्वर के सच्चे स्वरूप से भटक गए हैं, वे ही ऐसे विचार रखते हैं। फिर सच्चे वेदों की प्रामाणिकता का पता लगाकर ही वे यज्ञ करते हैं॥ 45॥
 
In reality, only those who have strayed from the true nature of God have such thoughts. Then, only after ascertaining the authenticity of the true Vedas, they perform the Yagyas (rituals).॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)