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mahabharat 5.43.44: इस प्रकार कुछ लोग वेदों का सार न जानते हुए भी अपने को विद्वान मानने लगते हैं; फिर वे लोभ के कारण (सांसारिक सुखों के फल के लिए) दान, अध्ययन और यज्ञों में प्रवृत्त हो जाते हैं। ॥44॥   |   mahabharat अध्याय 5.43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.43.44 
एवं वेदमविज्ञाय प्राज्ञोऽहमिति मन्यते।
दानमध्ययनं यज्ञो लोभादेतत् प्रवर्तते॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कुछ लोग वेदों का सार न जानते हुए भी अपने को विद्वान मानने लगते हैं; फिर वे लोभ के कारण (सांसारिक सुखों के फल के लिए) दान, अध्ययन और यज्ञों में प्रवृत्त हो जाते हैं। ॥44॥
 
In this way, some people, without knowing the essence of the Vedas, start believing that they are learned; then they get involved in charity, studies and performing sacrifices out of greed (for the fruits of worldly pleasures). ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)