श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.43.4 
सनत्सुजात उवाच
नैनं सामान्यृचो वापि न यजूंष्यविचक्षणम्।
त्रायन्ते कर्मण: पापान्न ते मिथ्या ब्रवीम्यहम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सनत्सुजात बोले - हे राजन! मैं आपसे झूठ नहीं कह रहा हूँ; न तो ऋग्वेद, न सामवेद, न यजुर्वेद ही अज्ञानी पापी को उसके पापकर्मों से बचा सकते हैं॥4॥
 
Sanatsujata said - O King, I am not telling you a lie; neither the Rig Veda, nor the Sama Veda, nor the Yajur Veda can protect an ignorant sinner from his sinful deeds. ॥4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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