श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.43.37 
सत्यात्मा भव राजेन्द्र सत्ये लोका: प्रतिष्ठिता:।
तांस्तु सत्यमुखानाहु: सत्ये ह्यमृतमाहितम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! आप सत्य के स्वरूप हो जाइए, यह सारा जगत् सत्य में ही स्थित है। बल, त्याग और अदोष आदि गुण भी भगवान के सच्चे स्वरूप की प्राप्ति कराते हैं; अमृत की प्रतिष्ठा सत्य में ही है। 37॥
 
Rajendra! You become the embodiment of truth, the whole world is established in truth only. Those qualities like strength, renunciation and non-guilt etc. also lead to attaining the true form of God; Amrit has its reputation only in truth. 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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