श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  5.43.36 
अष्टौ दोषा: प्रमादस्य तान् दोषान् परिवर्जयेत्।
इन्द्रियेभ्यश्च पञ्चभ्यो मनसश्चैव भारत।
अतीतानागतेभ्यश्च मुक्त्युपेत: सुखी भवेत्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
पाँच इन्द्रियाँ और छठा मन - अपने-अपने विषयों में लीन रहने की प्रवृत्ति, ये प्रमाद-संबंधी छः दोष हैं तथा भूतकाल की चिन्ता और भविष्यकाल की आशा - ये दो दोष हैं। इन आठ विकारों से मुक्त मनुष्य सुखी है। 36॥
 
India The five senses and the sixth mind - their tendency to indulge in their respective subjects, these are the six defects related to carelessness and the worry about the past and hope for the future - these are the two defects. A man free from these eight vices is happy. 36॥
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