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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  5.43.26-27 
मदोऽष्टादशदोष: स्यात् त्यागो भवति षड्‍‍विध:।
विपर्यया: स्मृता एते मददोषा उदाहृता:॥ २६॥
श्रेयांस्तु षड्‍‍विधस्त्यागस्तृतीयो दुष्करो भवेत्।
तेन दु:खं तरत्येव भिन्नं तस्मिन् जितं कृते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अभिमान में अठारह दोष होते हैं; ऊपर वर्णित अभिमान के विपरीत ही अभिमान के दोष हैं। त्याग के छह प्रकार हैं। इन छहों का त्याग बहुत अच्छा है; परन्तु इनमें से तीसरा, अर्थात् काम का त्याग, बहुत कठिन है। इससे मनुष्य तीनों प्रकार के दुःखों पर अवश्य विजय प्राप्त कर सकता है। काम का त्याग करने से सब कुछ जीत लिया जाता है। 26-27।
 
There are eighteen defects in pride; the opposites of pride mentioned above are the defects of pride. There are six types of renunciation. Renunciation of all the six types is very good; but the third of these, that is, renunciation of lust is very difficult. By this, a man can certainly overcome the three types of sorrows. By renouncing lust, everything is conquered. 26-27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)