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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 23-25
 
 
श्लोक  5.43.23-25 
दमो ह्यष्टादशगुण: प्रतिकूलं कृताकृते।
अनृतं चाभ्यसूया च कामार्थौ च तथा स्पृहा॥ २३॥
क्रोध: शोकस्तथा तृष्णा लोभ: पैशुन्यमेव च।
मत्सरश्च विहिंसा च परितापस्तथारति:॥ २४॥
अपस्मारश्चातिवादस्तथा सम्भावनाऽऽत्मनि।
एतैर्विमुक्तो दोषैर्य: स दान्त: सद्भिरुच्यते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
(निम्नलिखित अठारह विकारों के त्याग को ही अठारह गुण समझना चाहिए) - कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में विपरीत धारणा, मिथ्या भाषण, गुणों के विषय में दोषपूर्ण दृष्टिकोण, स्त्रियों की इच्छा, सदैव धन कमाने में लगे रहना, भोगों की इच्छा, क्रोध, शोक, तृष्णा, लोभ, चुगली करने की आदत, ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध, शास्त्रों का पालन न करना, कर्तव्य की विस्मृति, अधिक बोलना और अपने को बड़ा समझना - इन दोषों से जो रहित है, उसे जितेन्द्रिय कहते हैं।
 
The breath has eighteen qualities. (The renunciation of the following eighteen vices should be considered as the eighteen virtues) - Contrarian belief about duties and non-duties, false speech, flawed view of qualities, desire for women, always being engaged in earning money, desire for pleasures, anger, grief, thirst, greed, habit of gossiping, jealousy, violence, anger, non-observance of scriptures, forgetfulness of duty, excessive talk and considering oneself big - these The one who is free from defects is called a virtuous person (Jitendriya).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)