श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.43.21 
यस्त्वेतेभ्य: प्रभवेद् द्वादशभ्य:
सर्वामपीमां पृथिवीं स शिष्यात्।
त्रिभिर्द्वाभ्यामेकतो वार्थितो य-
स्तस्य स्वमस्तीति स वेदितव्य:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जो इन बारह व्रतों (गुणों) में निपुण है, वह इस पृथ्वी के समस्त लोगों को अपने वश में कर सकता है। जिसमें इनमें से तीन, दो अथवा एक भी गुण हो, उसे सब प्रकार की सम्पत्तियों से युक्त समझना चाहिए ॥ 21॥
 
He who has mastery over these twelve vows (qualities) can bring all the people of this earth under his control. He who has three, two or even one of these qualities should be considered to have all kinds of wealth. ॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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