श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.43.20 
धर्मश्च सत्यं च दमस्तपश्च
अमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षानसूया।
यज्ञश्च दानं च धृति: श्रुतं च
व्रतानि वै द्वादश ब्राह्मणस्य॥ २०॥
 
 
अनुवाद
धर्म, सत्य, इन्द्रिय संयम, तप, आसक्ति का अभाव, लज्जा, सहनशीलता, किसी के दोष न देखना, यज्ञ करना, दान देना, धैर्य और शास्त्रों का ज्ञान - ये ब्राह्मण के बारह व्रत हैं ॥20॥
 
Dharma, truth, control over the senses, penance, lack of attachment, shyness, tolerance, not seeing anyone's faults, performing yajna, giving charity, patience and knowledge of the scriptures - these are the twelve vows of a Brahmin. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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