| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण » श्लोक 2 |
|
| | | | श्लोक 5.43.2  | सनत्सुजात उवाच
यतो न वेदा मनसा सहैन-
मनुप्रविशन्ति ततोऽथमौनम्।
यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं
स तन्मयत्वेन विभाति राजन्॥ २॥ | | | | | | अनुवाद | | सनत्सुजात बोले, "हे राजन! जहाँ शब्दरूपी वेद भी मन के द्वारा नहीं पहुँच सकते, उस परम पुरुष का नाम मौन है; अतः वे मौनस्वरूप हैं। जिस परम पुरुष से वैदिक और लौकिक शब्द उत्पन्न हुए हैं, वे पूर्ण एकाग्रता से ध्यान करने पर प्रकाशमान हो जाते हैं॥ 2॥ | | | | Sanatsujata said, "O King! The name of that Supreme Being where the Vedas in the form of words cannot reach with the mind is silence; hence He is the embodiment of silence. The Supreme Being from whom the Vedic and worldly words have originated, comes to light when one meditates with full concentration.॥ 2॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|