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mahabharat 5.43.17: हे पुरुषश्रेष्ठ! जैसे शिकारी हिरणों को मारने का अवसर ढूँढ़ता रहता है, वैसे ही ये सभी दोष मनुष्यों की दुर्बलता देखकर उन पर आक्रमण करते हैं॥17॥   |   mahabharat अध्याय 5.43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.43.17 
एकैक: पर्युपास्ते ह मनुष्यान् मनुजर्षभ।
लिप्समानोऽन्तरं तेषां मृगाणामिव लुब्धक:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! जैसे शिकारी हिरणों को मारने का अवसर ढूँढ़ता रहता है, वैसे ही ये सभी दोष मनुष्यों की दुर्बलता देखकर उन पर आक्रमण करते हैं॥17॥
 
O best of men! Just as a hunter keeps a watch on deer looking for an opportunity to kill them, similarly each of these defects attacks humans after seeing their weakness.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)