श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.43.16 
क्रोध: कामो लोभमोहौ विधित्सा
कृपासूये मानशोकौ स्पृहा च।
ईर्ष्या जुगुप्सा च मनुष्यदोषा
वर्ज्या: सदा द्वादशैते नराणाम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
काम, क्रोध, लोभ, मोह, कटुता, क्रूरता, ईर्ष्या, मान, शोक, मद, ईर्ष्या और निन्दा - ये बारह दुर्गुण मनुष्य में स्थित हैं, ये सदा त्यागने योग्य हैं ॥16॥
 
Lust, anger, greed, attachment, bitterness, cruelty, envy, pride, grief, lust, jealousy and criticism - these twelve vices present in humans are always worth giving up. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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