| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण » श्लोक 15 |
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| | | | श्लोक 5.43.15  | सनत्सुजात उवाच
क्रोधादयो द्वादश यस्य दोषा-
स्तथा नृशांसानि दशत्रि राजन्।
धर्मादयो द्वादशैते पितॄणां-
शास्त्रे गुणा ये विदिता द्विजानाम्॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | सनत्सुजात ने कहा - राजन् ! क्रोध आदि तप के बारह दोष हैं और क्रूर लोग तेरह प्रकार के होते हैं। मन्वादि शास्त्रों में ब्राह्मणों के तथाकथित धर्म आदि बारह गुण प्रसिद्ध हैं ॥15॥ | | | | Sanatsujata said – King! There are twelve vices of penance like anger etc. and there are thirteen types of cruel people. In Manvadi Shastras, the so-called dharma etc. twelve qualities of Brahmins are famous. 15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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