श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.43.14 
धृतराष्ट्र उवाच
कल्मषं तपसो ब्रूहि श्रुतं निष्कल्मषं तप:।
सनत्सुजात येनेदं विद्यां गुह्यं सनातनम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "सनत्सुजातजी! मैंने निष्कलंक तप का माहात्म्य सुन लिया है। अब आप मुझे तप के दोष बताइए, जिससे मैं इस सनातन एवं गुप्त ब्रह्मतत्त्व को जान सकूँ।" ॥14॥
 
Dhritarashtra said, "Sanatsujataji! I have heard the importance of faultless penance. Now tell me the faults of penance, so that I can know this eternal and secret Brahmatattva." ॥14॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd