श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.43.12 
सनत्सुजात उवाच
निष्कल्मषं तपस्त्वेतत् केवलं परिचक्षते।
एतत् समृद्धमप्यृद्धं तपो भवति केवलम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
सनत्सुजात ने कहा, "हे राजन! यह तप सब प्रकार से दोषरहित है। इसमें विषय-वासनाओं का दोष नहीं है। इसीलिए इसे शुद्ध कहा गया है और इसीलिए यह शुद्ध तप स्वार्थपूर्ण तप की अपेक्षा फल की दृष्टि से बहुत श्रेष्ठ है ॥12॥
 
Sanatsujata said, "O King! This penance is flawless in every way. It does not have the defect of sensual desires. That is why it is called pure and that is why this pure penance is much better in terms of results than the penance with selfish motives. ॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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