श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.43.11 
धृतराष्ट्र उवाच
कथं समृद्धमसमृद्धं तपो भवति केवलम्।
सनत्सुजात तद् ब्रूहि यथा विद्याम तद् वयम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र ने पूछा - सनत्सुजातजी! केवल शुद्ध भक्तिपूर्वक किया गया तप किस प्रकार इतना प्रभावशाली और महान हो जाता है? कृपया हमें ऐसा बताइए जिससे हम उसे समझ सकें॥ 11॥
 
Dhritarashtra asked - Sanatsujataji! How does mere penance with pure devotion become so effective and great? Please tell us in a way that we can understand it.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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