श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.43.1 
धृतराष्ट्र उवाच
कस्यैष मौन: कतरन्नु मौनं
प्रब्रूहि विद्वन्निह मौनभावम्।
मौनेन विद्वानुत याति मौनं
कथं मुने मौनमिहाचरन्ति॥ १॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले— विद्वान्! इस मौन को क्या कहते हैं? [वाणी का संयम और ईश्वर का स्वरूप] इन दोनों में से मौन क्या है? कृपया यहाँ मौन की भावना का वर्णन कीजिए। क्या विद्वान् पुरुष मौन के द्वारा मौनस्वरूप ईश्वर को प्राप्त करता है? मुनि! इस संसार में लोग किस प्रकार मौन का अभ्यास करते हैं?॥1॥
 
Dhritarashtra said— Scholar! What is this silence called? [Restraint of speech and the nature of God] Which of these two is silence? Please describe the feeling of silence here. Does a learned man attain the God in the form of silence through silence? Sage! How do people in this world practice silence?॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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