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mahabharat 5.42.33: जैसे कुत्ता अपनी उल्टी खाता है, वैसे ही जो ब्राह्मण अपना प्रभाव दिखाकर जीविका चलाते हैं, वे ब्राह्मणों की उल्टी खाते हैं और इससे उनकी सदैव अवनति होती है ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 5.42: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 42: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.42.33 
यथा स्वं वान्तमश्नाति श्वा वै नित्यमभूतये।
एवं ते वान्तमश्नन्ति स्ववीर्यस्योपसेवनात्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जैसे कुत्ता अपनी उल्टी खाता है, वैसे ही जो ब्राह्मण अपना प्रभाव दिखाकर जीविका चलाते हैं, वे ब्राह्मणों की उल्टी खाते हैं और इससे उनकी सदैव अवनति होती है ॥33॥
 
Just as a dog eats its own vomit, so those brahmins who make a living by displaying their influence are the ones who eat the vomit of brahmins and this always leads to their degradation. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)