श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 42: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.42.24 
तस्मिन् स्थितो वाप्युभयं हि नित्यं
ज्ञानेन विद्वान् प्रतिहन्ति सिद्धम्।
तथान्यथा पुण्यमुपैति देही
तथागतं पापमुपैति सिद्धम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
परंतु भगवान् में स्थित होने पर विद्वान् पुरुष उस (भगवान् के) ज्ञान के द्वारा अपने पूर्वजन्म के पाप और पुण्य दोनों को नष्ट कर देता है; यह बात सदैव प्रसिद्ध है। यदि ऐसी स्थिति न हो, तो देहाभिमानी पुरुष कभी पुण्य का फल पाता है और कभी पूर्वजन्म के पाप का फल क्रमशः भोगता है॥24॥
 
But when established in God, a learned person destroys both his past sins and virtues through that (God's) knowledge; This thing is always famous. If such a situation does not occur, then a body-conscious person sometimes receives the fruits of virtue and sometimes experiences the fruits of previously acquired sins respectively. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)