श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 42: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.42.17 
धृतराष्ट्र उवाच
यानेवाहुरिज्यया साधुलोकान्
द्विजातीनां पुण्यतमान् सनातनान्।
तेषां परार्थं कथयन्तीह वेदा
एतद् विद्वान् नोपैति कथं नु कर्म॥ १७॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - जो पवित्र, सनातन और श्रेष्ठ लोक द्विजातियों के लिए यज्ञ करने से प्राप्त होने वाले बताए गए हैं, उन्हें यहाँ वेद परम पुरुषार्थ कहते हैं। ऐसा जानने वाला विद्वान् क्यों न शुभ कर्मों का आश्रय ले? 17॥
 
Dhritarashtra said - The sacred, eternal and elevated worlds which have been told to be attained by performing yagyas for the twice-caste people, here the Vedas call them as the ultimate effort. Why shouldn't a scholar who knows this take refuge in good deeds? 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)