श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 42: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.42.16 
स क्रोधलोभौ मोहवानन्तरात्मा
स वै मृत्युस्त्वच्छरीरे य एष:।
एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा
ज्ञाने तिष्ठन् न बिभेतीह मृत्यो:।
विनश्यते विषये तस्य मृत्यु-
र्मृत्योर्यथा विषयं प्राप्य मर्त्य:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे शरीर में स्थित यह अन्तरात्मा मोह के वश होकर क्रोध, लोभ (प्रमाद) और मृत्यु में परिणत हो जाता है। इस प्रकार जो मोहरूपी मृत्यु को जानकर ज्ञानी हो जाता है, वह इस संसार में कभी मृत्यु से नहीं डरता। उसके निकट आकर मृत्यु उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे मृत्यु के वश में आया हुआ मरणधर्मा मनुष्य नष्ट हो जाता है। 16॥
 
This inner soul within your body, under the influence of temptation, turns into anger, greed (negligence) and death. In this way, one who becomes knowledgeable after knowing the death of attachment, never fears death in this world. Coming near him, death gets destroyed in the same way as a mortal man who has come under the power of death. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)