श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 42: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.42.15 
अमूढवृत्ते: पुरुषस्येह कुर्यात्
किं वै मृत्युस्तार्ण इवास्य व्याघ्र:।
अमन्यमान: क्षत्रिय किंचिदन्य-
न्नाधीयीत निर्णुदन्निवास्य चायु:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जिसका मन विषय-भोगों में मोहित नहीं हुआ है, उस बुद्धिमान पुरुष को इस संसार में तिनके के मारे हुए बाघ की मृत्यु से क्या हानि हो सकती है? इसलिए राजन! विषय-भोगों के मूल कारण अज्ञान को नष्ट करने की इच्छा से मनुष्य को अन्य किसी भी सांसारिक वस्तु को तुच्छ समझकर उसका चिन्तन त्याग देना चाहिए। 15॥
 
What harm can the death of a tiger made of straw in this world do to a wise man whose mind has not been enticed by sensual pleasures? That's why Rajan! With the desire to destroy ignorance, which is the root cause of sensual pleasures, one should consider any other worldly object as nothing and give up thinking about it. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)