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श्लोक 5.41.10  |
भगवन् संशय: कश्चिद् धृतराष्ट्रस्य मानस:।
यो न शक्यो मया वक्तुं त्वमस्मै वक्तुमर्हसि॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु! धृतराष्ट्र के हृदय में कुछ संदेह है, जिसका समाधान करना मेरे लिए उचित नहीं है। इस विषय को समझाने में केवल आप ही समर्थ हैं।॥10॥ |
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| Lord! There is some doubt in the heart of Dhritarashtra, which is not appropriate for me to resolve. Only you are capable of explaining this matter.'॥10॥ |
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