श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 41: विदुरजीके द्वारा स्मरण करनेपर आये हुए सनत्सुजात ऋषिसे धृतराष्ट्रको उपदेश देनेके लिये उनकी प्रार्थना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.41.10 
भगवन् संशय: कश्चिद् धृतराष्ट्रस्य मानस:।
यो न शक्यो मया वक्तुं त्वमस्मै वक्तुमर्हसि॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! धृतराष्ट्र के हृदय में कुछ संदेह है, जिसका समाधान करना मेरे लिए उचित नहीं है। इस विषय को समझाने में केवल आप ही समर्थ हैं।॥10॥
 
Lord! There is some doubt in the heart of Dhritarashtra, which is not appropriate for me to resolve. Only you are capable of explaining this matter.'॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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