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mahabharat 5.40.32: किसी भी जीव में भाग्य का उल्लंघन करने की शक्ति नहीं है। मैं भाग्य को अचल मानता हूँ, उसके सामने प्रयत्न व्यर्थ हैं। ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 5.40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.40.32 
न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं भूतेन केनचित्।
दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
किसी भी जीव में भाग्य का उल्लंघन करने की शक्ति नहीं है। मैं भाग्य को अचल मानता हूँ, उसके सामने प्रयत्न व्यर्थ हैं। ॥32॥
 
No living being has the power to violate destiny. I consider destiny to be immovable, efforts are futile in front of it. ॥ 32॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये चत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुरवाक्यविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)