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mahabharat 5.40.25: जो ब्राह्मण प्रतिदिन जल से स्नान करता है, संध्यावंदन करता है, जल चढ़ाता है, प्रतिदिन जनेऊ धारण करता है, प्रतिदिन अध्ययन करता है, पतितों का अन्न त्यागता है, सत्य बोलता है और गुरु की सेवा करता है, वह ब्रह्मलोक से कभी भ्रष्ट नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 5.40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.40.25 
नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती
नित्यस्वाध्यायी पतितान्नवर्जी।
सत्यं ब्रुवन् गुरवे कर्म कुर्वन्
न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्मलोकात्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण प्रतिदिन जल से स्नान करता है, संध्यावंदन करता है, जल चढ़ाता है, प्रतिदिन जनेऊ धारण करता है, प्रतिदिन अध्ययन करता है, पतितों का अन्न त्यागता है, सत्य बोलता है और गुरु की सेवा करता है, वह ब्रह्मलोक से कभी भ्रष्ट नहीं होता।
 
A Brahmin who daily takes bath with water, performs evening prayers, offers water, etc., wears the sacred thread daily, studies daily, gives up the food of the fallen, speaks the truth and serves his Guru, is never corrupted from Brahmaloka. 25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)