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mahabharat 5.40.23: जो मनुष्य बुद्धि, धर्म, विद्या और आयु में बड़े अपने मित्र को आदर और सम्मानपूर्वक प्रसन्न करके उससे उसके कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में पूछता है, वह कभी मोह में नहीं पड़ता। 23.   |   mahabharat अध्याय 5.40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.40.23 
प्रज्ञावृद्धं धर्मवृद्धं स्वबन्धुं
विद्यावृद्धं वयसा चापि वृद्धम्।
कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य
य: सम्पृच्छेन्न स मुह्येत् कदाचित्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य बुद्धि, धर्म, विद्या और आयु में बड़े अपने मित्र को आदर और सम्मानपूर्वक प्रसन्न करके उससे उसके कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में पूछता है, वह कभी मोह में नहीं पड़ता। 23.
 
He who, after pleasing his friend who is elder in wisdom, religion, knowledge and age, with respect and honour, asks him about his duties and non-duties, he never falls into temptation. 23.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)