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mahabharat 5.40.21: भारत! यह आत्मा नदी है। इसमें स्थित पुण्य ही तीर्थ है। इसका उद्गम ईश्वर के सच्चे स्वरूप से है। धैर्य इसका किनारा है। दया इसकी लहरें हैं। पुण्य कर्म करने वाला मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र हो जाता है; क्योंकि लोभ रहित आत्मा सदैव पवित्र रहती है।   |   mahabharat अध्याय 5.40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.40.21 
आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्था
सत्योदका धृतिकूला दयोर्मि:।
तस्यां स्नात: पूयते पुण्यकर्मा
पुण्यो ह्यात्मा नित्यमलोभ एव॥ २१॥
 
 
अनुवाद
भारत! यह आत्मा नदी है। इसमें स्थित पुण्य ही तीर्थ है। इसका उद्गम ईश्वर के सच्चे स्वरूप से है। धैर्य इसका किनारा है। दया इसकी लहरें हैं। पुण्य कर्म करने वाला मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र हो जाता है; क्योंकि लोभ रहित आत्मा सदैव पवित्र रहती है।
 
Bharat! This soul is a river. Virtue in it is the pilgrimage. It has its origin from the true form of God. Patience is its banks. Kindness is its waves. A man who does virtuous deeds becomes pure by bathing in it; because a soul without greed is always pure. 21.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)