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mahabharat 5.40.17: हे प्रिये! जैसे पक्षी बिना फल-फूल के वृक्ष को छोड़कर चले जाते हैं, वैसे ही भूत के सम्बन्धी, मित्र और पुत्र भी उसे चिता पर ही छोड़कर लौट जाते हैं॥17॥   |   mahabharat अध्याय 5.40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.40.17 
उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातय: सुहृद: सुता:।
अपुष्पानफलान् वृक्षान् यथा तात पतत्रिण:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! जैसे पक्षी बिना फल-फूल के वृक्ष को छोड़कर चले जाते हैं, वैसे ही भूत के सम्बन्धी, मित्र और पुत्र भी उसे चिता पर ही छोड़कर लौट जाते हैं॥17॥
 
O dear! Just as birds leave a tree without any fruit or flowers, similarly, the relatives, friends and sons of the ghost leave him on the funeral pyre and return. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)