Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.40.12-13: हे प्रिये! अब मैं तुमसे यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा परम पुण्यमयी बात कहता हूँ - कामना, भय, लोभ तथा इस जन्म के लिए भी धर्म का त्याग मत करो। धर्म नित्य है, किन्तु सुख-दुःख अनित्य हैं। आत्मा नित्य है, किन्तु उसका कारण अनित्य है। तुम अनित्य को त्यागकर नित्य में रहो और संतोष को अपनाओ; क्योंकि संतोष ही सबसे बड़ा लाभ है॥12-13॥ | mahabharat अध्याय 5.40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
हे प्रिये! अब मैं तुमसे यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा परम पुण्यमयी बात कहता हूँ - कामना, भय, लोभ तथा इस जन्म के लिए भी धर्म का त्याग मत करो। धर्म नित्य है, किन्तु सुख-दुःख अनित्य हैं। आत्मा नित्य है, किन्तु उसका कारण अनित्य है। तुम अनित्य को त्यागकर नित्य में रहो और संतोष को अपनाओ; क्योंकि संतोष ही सबसे बड़ा लाभ है॥12-13॥
O dear! Now I am telling you this very important and most virtuous thing- never abandon Dharma out of desire, fear, greed and even for this life. Dharma is eternal, but happiness and sorrow are temporary. The soul is eternal, but its cause is temporary. You should abandon the temporary and stay in the permanent and adopt contentment; because contentment is the greatest gain.॥12-13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥