श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  5.39.60 
यत् सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते।
कामं तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह धर्म और अर्थ (धन) से विमुख न होने वाले प्रचुर सुखों का उपभोग करे, किन्तु मूर्खतापूर्ण व्रतों (जैसे निद्रा, प्रमाद आदि) में लिप्त न हो।
 
A man should enjoy ample pleasures which do not deviate from Dharma and Artha (wealth), but should not indulge in foolish vows (such as sleeplessness, negligence, etc.). 60.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)