श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.39.47 
ययोश्चित्तेन वा चित्तं निभृतं निभृतेन वा।
समेति प्रज्ञया प्रज्ञा तयोर्मैत्री न जीर्यति॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जिनका मन मन से, भेद भेद से और बुद्धि बुद्धि से मिल जाती है, उन दो मनुष्यों की मित्रता कभी नष्ट नहीं होती ॥47॥
 
The friendship of two people whose mind meets mind, secret secret meets secret and intelligence meets intelligence never gets destroyed. 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)