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mahabharat 5.39.3: इस संसार में एक व्यक्ति दान देने के कारण प्रिय होता है, दूसरा मधुर वचन बोलने के कारण प्रिय होता है, और तीसरा मंत्र और औषधियों की शक्ति के कारण प्रिय होता है; परन्तु जो वास्तव में प्रिय है, वह सदैव प्रिय ही रहता है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 5.39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.39.3 
प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापर:।
मन्त्रमूलबलेनान्यो य: प्रिय: प्रिय एव स:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में एक व्यक्ति दान देने के कारण प्रिय होता है, दूसरा मधुर वचन बोलने के कारण प्रिय होता है, और तीसरा मंत्र और औषधियों की शक्ति के कारण प्रिय होता है; परन्तु जो वास्तव में प्रिय है, वह सदैव प्रिय ही रहता है॥3॥
 
In this world, one person becomes dear because of almsgiving, another becomes dear because of sweet words spoken, and a third becomes dear because of the power of mantras and medicines; but the one who is dear in reality is dear always.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)