श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.39.2 
विदुर उवाच
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन्।
लभते बुद्धॺवज्ञानमवमानं च भारत॥ २॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी बोले - हे भरत! यदि बृहस्पति काल के विरुद्ध कुछ भी बोलें, तो यह उनका अपमान होगा और उनकी बुद्धि का हनन भी होगा॥ 2॥
 
Vidur ji said - O Bharata! If Brihaspati were to speak anything contrary to the time, it would be an insult to him and also a violation of his intellect.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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