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mahabharat 5.37.61: यदि वही अग्नि लकड़ी को मथकर प्रज्वलित की जाए तो वह अपने तेज से लकड़ी, वन तथा अन्य वस्तुओं को बहुत शीघ्र जला देती है। 61.   |   mahabharat अध्याय 5.37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  5.37.61 
स एव खलु दारुभ्यो यदा निर्मथ्य दीप्यते।
तद् दारु च वनं चान्यन्निर्दहत्याशु तेजसा॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
यदि वही अग्नि लकड़ी को मथकर प्रज्वलित की जाए तो वह अपने तेज से लकड़ी, वन तथा अन्य वस्तुओं को बहुत शीघ्र जला देती है। 61.
 
If the same fire is ignited by churning wood, then with its brilliance it burns the wood, forest and other things very quickly. 61.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)