श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  5.37.58 
प्रज्ञाशरेणाभिहतस्य जन्तो-
श्चिकित्सका: सन्ति न चौषधानि।
न होममन्त्रा न च मङ्गलानि
नाथर्वणा नाप्यगदा: सुसिद्धा:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य ज्ञानरूपी बाण से घायल हो गया है, उसके लिए न तो कोई चिकित्सक है, न कोई औषधि, न कोई होम, न कोई मन्त्र, न कोई शुभ अनुष्ठान, न कोई अथर्ववेद में वर्णित कोई क्रिया और न ही कोई सिद्ध जड़ी-बूटी ॥58॥
 
For the person who has been struck by the arrow of wisdom, there is no doctor, no medicine, no homa, no mantra, no auspicious ceremony, no practice prescribed in the Atharvaveda, and no well-proven herb. ॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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