श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  5.37.57 
स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्यायप्रभुशत्रुषु।
भोगेष्वायुषि विश्वासं क: प्राज्ञ: कर्तुमर्हति॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
कौन इतना बुद्धिमान है कि स्त्री, राजा, सर्प, पढ़े हुए ग्रंथ, बलवान, शत्रु, भोग और आयु इन सब पर पूर्ण विश्वास कर सके? ॥57॥
 
Who is so wise that he can have full faith in a woman, a king, a serpent, the read text, a powerful person, the enemy, pleasures and age? ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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